Monday, 31 March 2014

Update


लेकिन अब जब विवाह से पहले ही महिलाएं अपना कौमार्य खोती जा रही हैं तो ऐसे में इस शब्द का क्या वजूद बचता है. इस लेख का अर्थ या आशय इस बात से कदापि नहीं है कि विवाह से पहले शारीरिक संबंधों में लिप्त रहना कितना सही है या फिर पूरी तरह वर्जित होना चाहिए. यहां मसला बस इस बात का है कि आज के समय के मद्देनजर जब विवाह और कौमार्य का आपस में कोई संबंध ही नहीं शेष रह गया है तो फिर क्यों हम केवल इसी आधार पर महिलाओं को ‘’कुमारी’’ की उपाधि देते हैं. आज जब महिलाओं का अविवाहित होना इस बात के लिए आश्वासित नहीं करता कि वे कौमार्य के कसौटी पर खरी उतरती हैं, तो फिर उनका कुमारी कहलाना कहां तक उचित कहा जा सकता है? भले ही यह सवाल व्यक्तिगत दृष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण ना हो लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस सवाल का सामाजिक पहलू बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण है इसीलिए इसका जवाब ढूंढ़ना बहुत जरूरी है.

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